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शैक्षिक समानता का परिचय
शैक्षिक अवसरों की समानता का अर्थ है राज्य द्वारा देश के सभी बच्चों के लिए स्थान जाति धर्म अथवा लिंग आदि किसी भी आधार पर भेद किए बिना एक निश्चित स्तर तक की शिक्षा अनिवार्य एवं निशुल्क रूप से सुलभ कराना और उनकी इस शिक्षा प्राप्त करने में आगे आने वाली कठिनाइयों का निवारण करना साथ ही देश के सभी बच्चों और युवकों को इससे आगे की शिक्षा उनकी रुचि रुझान योग्यता क्षमता और आवश्यकता अनुसार सुलभ कराना और उनकी इस शिक्षा प्राप्त करने में आने वाली कठिनाइयों का निवारण करना ही शैक्षिक अवसरों की सामान्य कहलाता है
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भारत में शैक्षिक अवसरों की समानता

वर्तमान में हमारे देश में शिक्षा की स्थिति मिश्रित है। विद्यालयों में नामांकन में तो वृद्धि हो रही है, लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता तथा संस्थागत एवं बुनियादी ढांचे में सुधार की अभी भी अत्यंत आवश्यकता है। धीरे-धीरे देश की साक्षरता दर में वृद्धि हो रही है। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में साक्षरता दर लगभग 74% है। संक्षेप में, भारतीय शिक्षा प्रणाली विस्तार से गुणवत्ता की ओर बढ़ रही है, किन्तु शिक्षा में समानता और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच सुनिश्चित करना अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

ग्रामीण और शहरी शिक्षा में अंतर :-

भारत में शहरी और ग्रामीण शिक्षा के बीच प्रमुख अंतर बुनियादी ढांचे, शिक्षकों की गुणवत्ता तथा डिजिटल संसाधनों तक पहुंच में देखने को मिलता है। शहरी छात्रों को बेहतर निजी विद्यालय, तकनीकी साधन और कोचिंग की सुविधाएं प्राप्त होती हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्र अभी भी शिक्षकों की कमी, खराब कनेक्टिविटी और संसाधनों के अभाव से जूझ रहा है। इसके अतिरिक्त, शहरी और ग्रामीण साक्षरता दर में भी अंतर पाया जाता है; जहां शहरी साक्षरता दर 87.7% है, वहीं ग्रामीण साक्षरता दर 73.5% है।

ग्रामीण और शहरी शिक्षा में प्रमुख अंतर निम्नलिखित हैं :-

  • संसाधन और तकनीक में अंतर :-
    शहरी विद्यालयों में स्मार्ट क्लासरूम, इंटरनेट और अच्छी लाइब्रेरी उपलब्ध होती हैं, जबकि ग्रामीण विद्यालयों में कंप्यूटर और इंटरनेट की कमी होती है।
  • शिक्षकों की गुणवत्ता और उपलब्धता :-
    शहरी क्षेत्रों में अनुभवी और योग्य शिक्षकों की अधिकता होती है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर एक ही शिक्षक कई कक्षाओं को संभालता है।
  • निजी कोचिंग पर निर्भरता :-
    शहरी क्षेत्रों में प्रति छात्र निजी कोचिंग पर लगभग ₹3988 खर्च किया जाता है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह खर्च लगभग ₹1793 प्रति छात्र है। यह अंतर दोनों क्षेत्रों के बीच असमानता को दर्शाता है।
  • भाषा और माध्यम :-
    ग्रामीण शिक्षा मुख्यतः हिंदी या क्षेत्रीय भाषाओं में होती है, जबकि शहरी क्षेत्रों में शिक्षा का माध्यम प्रायः अंग्रेजी होता है।
  • शिक्षण संस्थानों की उपलब्धता :-
    शहरी क्षेत्रों में अच्छे शिक्षण संस्थान आसानी से उपलब्ध होते हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में इनका अभाव देखने को मिलता है।
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