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आर्थिक कारण :-
वेदों में भी कहा गया है—“हे दरिद्रता! तुम मेरे द्वार के पास से भी होकर न जाना।” मानव की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति का आधार धन होता है। हमारे देश में वर्षों के आर्थिक विकास के पश्चात भी प्रति व्यक्ति आय अभी भी कम है, और अधिकांश जनसंख्या निर्धनता रेखा के आसपास जीवन यापन कर रही है। ऐसी स्थिति में निर्धन वर्ग के लिए शिक्षा की अपेक्षा रोटी, कपड़ा और मकान अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं, जिससे वे शिक्षा के अवसरों का लाभ उठाने में असमर्थ रहते हैं। - सामाजिक कारण :-
शिक्षा का प्रचार-प्रसार तब तक कठिन है, जब तक समाज में शिक्षा के प्रति महत्व की भावना विकसित नहीं होती। स्वतंत्रता के वर्षों बाद भी कुछ सामाजिक मान्यताएं शिक्षा में असमानता का कारण बनी हुई हैं, जैसे बालिकाओं को शिक्षा से वंचित रखना या कुछ जातियों को शिक्षा के अधिकार से दूर रखना। समाज में व्याप्त रूढ़ियां और परंपराएं भी इस समस्या को बढ़ाती हैं। - लैंगिक भेदभाव :-
भारतीय समाज में शिक्षा की प्रगति के बावजूद महिलाओं के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण पूरी तरह विकसित नहीं हो पाया है। बालिकाओं को आज भी द्वितीय स्थान दिया जाता है, जिसके कारण स्त्री साक्षरता दर लगभग 55% तक सीमित है, जबकि पुरुष साक्षरता दर लगभग 75% है। - शारीरिक एवं मानसिक बाधाएं :-
हमारे देश में शारीरिक एवं मानसिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए शिक्षा की पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। इस वर्ग को समाज के समान क्रियाकलापों में पूर्ण रूप से शामिल नहीं किया गया है। विशेष रूप से दिव्यांग बच्चों के लिए विद्यालयों की संख्या कम होने के कारण उन्हें शिक्षा प्राप्त करने के अवसर सीमित मिलते हैं। - सामाजिक स्तर :-
वर्तमान समय में समाज मुख्यतः तीन वर्गों—उच्च वर्ग, मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग—में विभाजित है। कुछ शिक्षण संस्थान केवल उच्च वर्ग के लिए ही उपयुक्त होते हैं, जबकि निम्न वर्ग के बच्चों के लिए शिक्षा प्राप्त करने के अवसर अपेक्षाकृत कम उपलब्ध होते हैं।