सीखने की प्रक्रिया का सम्बन्ध दो बातों से होता है—
(1) कभी-कभी बालक सिखाने से सीखता है।
(2) कभी-कभी बालक किसी बात को स्वयं सीख लेता है।
अर्थात् सीखने की प्रक्रिया केवल पढ़ाने तक ही सीमित नहीं होती है, अपितु विभिन्न परिस्थितियों में बालक स्वयं भी सीखता है। शिक्षण प्रक्रिया में शिक्षक एवं शिक्षार्थी के बीच अंतःक्रिया होती है।
सीखने की परिस्थितियाँ :-
सीखने की प्रक्रिया में शिक्षक एवं शिक्षार्थी से सम्बन्धित ऐसी अनेक परिस्थितियाँ होती हैं, जो सीखने व सिखाने में बाधा व सहायता देती हैं। अतः सीखने की प्रक्रिया में निम्न महत्वपूर्ण तत्व आते हैं—
- सिखाने की आवश्यकता :-
कोई व्यक्ति या शिक्षक बालक को जो बात सिखाना या पढ़ाना चाहता है, वह बालक के लिए क्यों आवश्यक है, यह स्पष्ट होना चाहिए। दूसरे शब्दों में, यह कहा जा सकता है कि जिस बात की आवश्यकता है, उसे सीखना हमारे लिए महत्वपूर्ण है। - लक्ष्य निर्धारण :-
किसी भी तथ्य को सीखने में लक्ष्य का निर्धारण अत्यन्त महत्वपूर्ण होता है। शिक्षक जब बालक की आवश्यकता अनुभव करते हैं, तब उसे सिखाने के लिए लक्ष्य का निर्धारण करते हैं। इसी आधार पर वे सीखने का लक्ष्य निर्धारित करते हैं। - किसी बात को सीखने या सिखाने के लिए तैयारी :-
किसी भी बात को सिखाने या सीखने से पहले विद्यार्थी का मानसिक रूप से तैयार होना चाहिए। तैयार होने पर ही वह उस कार्य को जल्दी सीख सकता है।
परिस्थितियों का निर्माण :-
परिस्थितियों का निर्माण शिक्षक के द्वारा किया जाता है, क्योंकि इसका प्रभाव विद्यार्थी पर पड़ता है। जब सीखने के सिद्धान्तों का प्रयोग उचित ढंग से किया जाता है, तब शिक्षक विद्यार्थियों को किसी बात को सिखाने के लिए परिस्थितियों का निर्माण करते हैं।
परिस्थितियों का निर्माण बालक की आयु, बुद्धि, रुचि, व्यक्तिगत भिन्नता आदि को ध्यान में रखकर किया जाता है, ताकि बालक अधिक से अधिक सीख सके।
अधिगम प्रक्रिया :-
परिस्थितियों का निर्माण
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तत्परता
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लक्ष्य निर्धारण
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आवश्यकता