शैशवावस्था जन्म से 5–6 वर्ष मानी जाती है। यह मानव विकास की प्रथम एवं सबसे महत्वपूर्ण अवस्था है, जिसे सीखने का आदर्श काल माना जाता है। इसकी मुख्य विशेषताओं में तीव्र शारीरिक एवं मानसिक विकास, दूसरों पर पूर्ण निर्भरता, अनुकरण के द्वारा सीखने की प्रवृत्ति, जिज्ञासा की प्रबलता आदि सम्मिलित हैं।
- तीव्र शारीरिक और मानसिक विकास – इस अवस्था में बच्चों में शारीरिक और मानसिक विकास तीव्र गति से होता है।
- सीखने की प्रक्रिया में तीव्रता – इस अवस्था में बालक बहुत जल्दी नई चीजें सीखता है और उसमें जिज्ञासा की भावना प्रबल होती है।
- अनुकरण की प्रवृत्ति – बालक अपने आसपास के वातावरण और बड़ों का अनुकरण करके सीखता है, जैसे—मां के द्वारा किए गए कार्यों का अनुकरण करना।
- स्व-प्रेम की भावना – शिशु केवल अपनी सुख-सुविधाओं और जरूरतों के बारे में सोचता है, जिसे स्व-प्रेम कहा जाता है।
- सामाजिक भावना का अभाव – इस अवस्था में शिशु में सामाजिक भावना का अभाव पाया जाता है।
- कल्पना की सजीवता – कुप्पुस्वामी के शब्दों में, बालक की कल्पना बहुत सजीव होती है। वह सत्य और असत्य में अंतर नहीं कर पाता, फलस्वरूप वह सत्यवादी जान पड़ता है।
- संवेगों का प्रदर्शन – शिशु में जन्म के बाद उत्तेजना के अलावा अन्य संवेग धीरे-धीरे विकसित होते हैं। बाल मनोवैज्ञानिकों ने शिशु में मुख्य रूप से चार संवेग माने हैं—क्रोध, प्रेम, भय और पीड़ा।