भाषा विकास

बाल मनोवैज्ञानिकों के अनुसार भाषा विकास की निम्नलिखित अवस्थाएं या चरण होते हैं—

  1. जन्म रोदन — इस अवस्था या चरण में बच्चों में रोने का व्यवहार देखा जाता है। जन्म के बाद बच्चों में यही क्रिया सबसे पहले देखी जाती है। कुछ मनोवैज्ञानिक इसे भाषा विकास की प्रथम अवस्था मानते हैं। उनके अनुसार बच्चे रोदन के माध्यम से अपने भाव या विचार की अभिव्यक्ति करते हैं, इसलिए रोदन भी एक भाषा है। लेकिन अधिकांश मनोवैज्ञानिक जन्म रोदन को भाषा नहीं मानते हैं। उनके अनुसार रोदन के पीछे शारीरिक कष्ट होता है, किसी भाव या विचार की अभिव्यक्ति नहीं होती।
  2. बलबलाने की अवस्था — इस अवस्था में बच्चे अस्पष्ट ध्वनि की अभिव्यक्ति करते हैं। इस ध्वनि के माध्यम से वे अपने विचारों तथा भावों को दूसरे तक पहुँचाने का प्रयास करते हैं। इसी कारण बलबलाने के व्यवहार को भाषा के रूप में परिभाषित किया जाता है।
  3. एक शब्दीय अवस्था — भाषा विकास की तीसरी अवस्था में बच्चे एक शब्द का उच्चारण करने लगते हैं। वे एक शब्द बोलकर पूरे वाक्य का काम लेते हैं। सामान्यतः वे संज्ञान शब्द पहले बोलते हैं। यह बात उल्लेखनीय है कि भाषा विकास का आधार श्रवण संवेदना है। बच्चे दूसरों को जिन शब्दों का उच्चारण करते सुनते हैं, प्रायः वे उन्हीं शब्दों का उच्चारण करना सीख लेते हैं। बच्चे अक्सर दादा, दादी, मां, पापा, मम्मी आदि शब्दों का उच्चारण अपनी सांस्कृतिक परिवेश के अनुसार सीख लेते हैं। यह अवस्था एक वर्ष की आयु से एक वर्ष छह माह या दो वर्ष तक रहती है।
  4. सरल वाक्य अवस्था — इस अवस्था में बच्चे सबसे सरल वाक्य बोलना सीख लेते हैं। अब वे एक संज्ञा के साथ क्रिया लगाकर बोलने लगते हैं, जैसे— पानी ला, दूध दो इत्यादि। इसी तरह वे “मां दूध दे”, “दादी पानी ला” आदि सरल वाक्य बोलने लगते हैं। यह अवस्था 2 वर्ष से 3 वर्ष तक की अवधि में देखी जाती है।
  5. जटिल वाक्य अवस्था — यह अवस्था 3 वर्ष से 5 वर्ष की आयु के बीच होती है। इस अवस्था में बच्चे जटिल वाक्य बोलने लगते हैं। अब वे विशेषण तथा क्रिया-विशेषण का उपयोग करने लगते हैं। इसी प्रकार संयोजक शब्दों, जैसे— तथा, किंतु, आदि का उपयोग करना सीख लेते हैं।
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