देवनागरी लिपि का विकास –
ब्राह्मी लिपि → गुप्त लिपि → कुटिल लिपि → शारदा लिपि → प्राचीन नागरी लिपि → देवनागरी लिपि विकसित हुई।
ब्राह्मी लिपि –
- सोमेटिक आरामी लिपि से विकसित हुई।
- कुछ पाश्चात्य विद्वान इसकी उत्पत्ति प्राचीन फिनिशियन लिपि से मानते हैं।
- भगवान श्री ऋषभदेव ने अपनी पुत्री ब्राह्मी को अक्षर-अंक का ज्ञान दिया, फिर माँ ब्राह्मी ने इस लिपि का निर्माण किया। यह जैन धर्म की देन है।
- चौथी–तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में इसकी उत्पत्ति मौर्यों द्वारा मानी जाती है। इस लिपि का सबसे पुराना रूप अशोक के शिलालेखों में मिलता है।
- बौद्ध ग्रंथ ‘ललित विस्तार’ (64 लिपियों का उल्लेख) में, जो बुद्ध को सिखाई गईं, उनमें नागरी लिपि का नाम नहीं है, ब्राह्मी लिपि का नाम है।
- जैनों के ‘पन्नवना सूत्र’ और ‘समावयांग सूत्र’ में 18 लिपियों के नाम दिए गए हैं, जिनमें पहला नाम बम्भी (ब्राह्मी) है।
विशेष – मात्रात्मक लिपि / संयुक्त अक्षरों का प्रयोग हुआ / बाएँ से दाएँ लिखी जाती है।
भट्टीप्रोलि लिपि – ब्राह्मी का परिवर्तित रूप (जो आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले के भट्टीप्रोली गाँव से विकसित हुई)।
गुप्त लिपि –
• गुप्त लिपि, गुप्त साम्राज्य के समय संस्कृत लिखने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली लिपि थी; इसे गुप्त ब्राह्मी लिपि या लेट ब्राह्मी लिपि भी कहते हैं।
• इस लिपि में 5 स्वर तथा 37 अक्षर थे।
• इस लिपि की खोज 1836 में उत्तराखंड के बाराहाट जिले में पीतल के त्रिशूल पर अंग्रेज़ी विद्वान जेम्स प्रिंसेप ने की थी।
कुटिल लिपि –
- उत्तरी लिच्छवी लिपि / भारत में विकृताक्षर लिपि / सिद्ध मात्रिक लिपि / न्यूनकोणीय लिपि भी कहा जाता है।
- इस लिपि का प्रचलन छठी से नवमी सदी तक हुआ।
- कुटिल लिपि में अक्षर टेढ़े-मेढ़े, आड़े-तिरछे, कुटिल ढंग के थे।
- यह लिपि नेपाल में आशु वर्मा के शासन के बाद प्रचलन में आई।
शारदा लिपि –
- शारदा लिपि कश्मीर की अधिष्ठात्री देवी शारदा के नाम पर मानी जाती है, जिससे वह शारददेश/शारद मंडल कहलाता है; इसी से शारदा लिपि का नामकरण हुआ।
- आठवीं से 12वीं सदी के बीच भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी-पश्चिमी हिस्से में यह लिपि बोली जाती थी।
- कश्मीर एवं आसपास के इलाकों में इस लिपि का इस्तेमाल किया जाता था।
- शारदा लिपि के ग्रंथ अफगानिस्तान में मिले हैं।
- अलबरूनी ने इसे “सिद्ध मात्रिक” नाम दिया। यही कारण है कि शारदा वर्णमाला “ॐ स्वस्ति सिद्धम्” से प्रारंभ की जाती है।
विशेष – सराहा (चंबा, हिमाचल) से प्राप्त प्रशस्ति शारदा लिपि का पहला लेख माना जाता है।
प्राचीन नागरी लिपि –
• नागरी लिपि का समुचित विकास आठवीं सदी में हुआ। यह गुजरात के राष्ट्रकूट नरेशों की लिपि थी।
• ब्राह्मी लिपि के कई क्षेत्रीय रूपांतर थे; इनमें से एक रूपांतर “उत्तरी शाखा” के रूप में था, जिसे नागरी कहते थे। इसी से देवनागरी का विकास हुआ।
• देव नगर (काशी) के नाम से देवनागरी का नामकरण हुआ।
• नागर स्थापत्य शैली (मध्य युग) के कारण देवनागरी नामकरण हुआ।
• कुछ लोगों का कहना था कि यह गुजरात के नगर ब्राह्मणों की लिपि थी, इसलिए देवनागरी कहने लगे, लेकिन यह मत भी पुष्ट नहीं हुआ।
• ब्राह्मी लिपि की उत्तरी शाखा नागरी का प्रयोग देवभाषा संस्कृत के लिए होने लगा, तो इस लिपि को देवनागरी कहा जाने लगा।
विशेष – देवनागरी लिपि का विकास ब्राह्मी लिपि से हुआ है। इस लिपि का प्रयोग सर्वप्रथम गुजरात नरेश जय भट्ट के शिलालेखों में मिलता है।
• राष्ट्रकूट राजा दंतिदुर्ग के ताम्रपत्र के आधार पर देवनागरी लिपि का दक्षिणी नागरी लिपि (नंदी नागरी लिपि) नाम दक्षिण भारत में संवत 675 (754 ई.) में पड़ा।