भाषा और समाज

सर्वप्रथम मुंबई राज्य के महादेव गोविंद रानाडे ने लिपि सुधार समिति गठित की।
20वीं सदी के प्रारंभ में लोकमान्य तिलक ने अपने पत्र ‘केसरी’ में लिपि सुधार पर चर्चा की।
काका कालेलकर ने एक ही बारहखड़ी का सुझाव देकर स्वर-ध्वनियों की संख्या कम कर दी।
श्रीनिवास जी ने सुझाव दिया कि इस लिपि से महाप्राण ध्वनियाँ निकाल दी जाएँ और उनके स्थान पर अल्पप्राण ध्वनियों के नीचे कोई चिन्ह लगाकर काम चलाया जाए।

(महाप्राण ध्वनियाँ – 2, 4, + उष्मस्थ + ह)
(अल्पप्राण ध्वनियाँ – 1, 3, 5 + अन्तस्थ + स्वर)

05 Oct. 1941 को हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग ने लिपि सुधार समिति के सुझावों में—
ह्रस्व ‘इ’ की मात्रा को व्यंजन से पूर्व लगाने,
मात्राओं को उच्चारण क्रम में लगाने,
‘प्र’, ‘श्र’ आदि को उसी रूप में लिखने संबंधी सुझाव दिए।

सन 1947-48 ईस्वी में यूपी सरकार ने आचार्य नरेंद्र देव की अध्यक्षता में लिपि सुधार समिति गठित की। इसके प्रमुख सुझाव निम्न हैं—

  1. स्वरों की बारहखड़ी भ्रामक है।
  2. अनुस्वार एवं पंचम वर्ण के स्थान पर सर्वत्र शून्य का प्रयोग किया जाए।
Scroll to Top