ध्वनि (Sound) –
भाषा की सबसे छोटी मौखिक इकाई ध्वनि कहलाती है। उच्चारण की दृष्टि से भाषा की लघुत्तम और महत्त्वपूर्ण इकाई ध्वनि है, जिसे स्वर भी कहा जाता है। वायु-तरंगों के माध्यम से जो श्रवणेन्द्रिय को कम्पित कर बोध कराती है, वह ध्वनि कहलाती है। किसी भी प्रकार की क्रिया; जैसे— गिरने, उठने, बैठने और आघात आदि से सामान्य वातावरण में जो कम्पन उत्पन्न होता है, वह सभी ध्वनि के अन्तर्गत ही आता है। मानव शरीर के जिन अवयवों से ध्वनि उत्पन्न होती है, उन्हें उच्चारण के अवयव या ध्वनि-यंत्र अथवा वाक्-तंत्र कहा जाता है। फेफड़े, श्वासनली, स्वरयंत्र, काकल, कंठ, नासिका, दंत, जिह्वा और ओष्ठ आदि प्रमुख उच्चारण के अवयव हैं।
शब्द (Words) –
सार्थकता की दृष्टि से भाषा की लघुत्तम, अनिवार्य और स्वतंत्र इकाई शब्द है, अर्थात् यह सार्थक ध्वनियों का समूह है। रचना की दृष्टि से शब्द के तीन भेद— रूढ़, यौगिक और योगारूढ़— होते हैं, जबकि रूपांतरण की दृष्टि से शब्द के दो भेद हैं— विकारी और अविकारी। अर्थ के नज़रिये से यदि विचार किया जाए, तो शब्द के दो भेद होते हैं— एकार्थी और अनेकार्थी।
भर्तृहरि ने शब्द को सभी भावों और अर्थों का साधन माना है।
भाषा की सबसे दीर्घतम इकाई शब्द है, लेकिन इसका स्पष्ट मंतव्य नहीं समझ सकते, जब तक इसको वाक्य में नहीं बदलेंगे।
उदा.— कमल (किसी व्यक्ति का नाम), कमल (फूल का नाम)
चंपा (फूल का नाम), चंपा (किसी औरत का नाम)
पद (Post) –
वाक्य में शब्दों को जिस रूप में प्रयोग किया जाता है, वह पद कहलाता है, अर्थात् वाक्य में प्रयोग्य शब्द-रूप पद है। यह सविभक्तिक होता है। इससे तात्पर्य यह है कि यह विभाजन करने वाला होता है। विभक्तियों के संयुग्मन से एक शब्द के कई पद या रूप बनते हैं, जो भिन्न-भिन्न अर्थ समाहित किए रहते हैं। शब्द का वाक्य में तभी प्रयोग हो सकता है, जब उसके साथ विभक्ति-प्रत्यय का प्रयोग किया गया हो। पद के बिना वाक्य-रचना असम्भव है। जब तक कोई शब्द पद नहीं बनता, तब तक वह भाव-बोधन और अर्थ-वहन में सर्वथा असमर्थ रहता है। अतः शब्द के उस रूप को पद कहा जाता है, जो विभक्ति और प्रत्यय का संयोग ग्रहण कर तथा किसी वाक्य में प्रयुक्त होकर अर्थ-बोध और भाव-बोध में हमेशा समर्थ होता है। इस प्रकार वाक्य पदों का समूह होता है। यह वाक्य की योग्यतम इकाई है, जिसका विकास लिंग, वचन, कारक, पुरुष, काल और वाच्य आदि के माध्यम से होता है।
वाक्य (Sentence) –
सामान्यतः सार्थक और व्यवस्थित पद-समूह को वाक्य कहा जाता है, जिसके द्वारा भाव की पूर्ण अभिव्यक्ति होती है। वाक्य एक पद भी हो सकता है और पद-समूह भी। वाक्य क्रियायुक्त और क्रियाविहीन भी होता है। पद और वाक्य का अटूट संबंध है। पद के बिना वाक्य की कल्पना नहीं की जा सकती। व्यवहार में आप बोलने के लिए वाक्यों का ही प्रयोग करते हैं। वाक्य भाषा की सहज इकाई है, जिसमें एक या एक से अधिक शब्द या पद होते हैं। प्रत्येक भाषा में वाक्य-रचना की अपनी व्यवस्था होती है।
भाषा की सबसे दीर्घतम इकाई वाक्य है, जिसका स्पष्ट मंतव्य समझ सकते हैं।
उदा.— कमल जा रहा है (किसी व्यक्ति का नाम)
कमल खिल रहा है (फूल का नाम)
महर्षि पतंजलि के अनुसार, “क्रिया, अव्यय, कारक और विशेषण जहाँ एकत्र हों, उसे वाक्य कहते हैं।”
अर्थ (Meaning) –
बिना अर्थ के भाषा, शब्द और वाक्य का कोई औचित्य नहीं होता है। यास्क का मत है कि, “जिस प्रकार अग्नि के अभाव में सूखा ईंधन जल नहीं सकता, ठीक उसी प्रकार बिना अर्थ को जाने-समझे जो शब्द दोहराया जाता है, वह कभी भी मुख्य विषय पर प्रकाश नहीं डाल सकता।” अर्थ शब्द की अंतरंग शक्ति का नाम है, क्योंकि शब्द बहिर्मुख होता है, जबकि अर्थ अभ्यंतर एवं अपृथक होता है।
शब्द की सम्पूर्ण गरिमा अर्थ पर ही टिकी रहती है। सामान्यतः अर्थ-सम्प्रेषण के 5 तत्त्व होते हैं— (1) वक्ता, (2) श्रोता, (3) प्रतीक, (4) वस्तु और (5) निर्देश। अर्थ के साथ जुड़कर ही भाषा का औचित्य सिद्ध होता है।