भाषा और समाज

लिपि और भाषा का आपस में गहरा संबंध है, परंतु दोनों एक ही चीज़ नहीं हैं। भाषा उच्चारित ध्वनियों पर आधारित होती है, जबकि लिपि उन ध्वनियों को लिखित रूप में व्यक्त करने की प्रणाली है।

नीचे लिपि और भाषा के बीच प्रमुख अंतर दिए जा रहे हैं—

भाषा लिपि
प्रत्येक भाषा की अपनी ध्वनियाँ होती हैं। सामान्यतः एक लिपि किसी भी भाषा में लिखी जा सकती है।
भाषा सूक्ष्म होती है। लिपि स्थूल होती है।
भाषा में अपेक्षाकृत अस्थायित्व होता है, क्योंकि उच्चारित होते ही भाषा विलीन हो जाती है। लिपि में अपेक्षाकृत स्थायित्व होता है, क्योंकि लिखे हुए शब्द लंबे समय तक सुरक्षित रहते हैं।
भाषा ध्वन्यात्मक होती है। लिपि दृश्यात्मक होती है।
भाषा तुरंत प्रभाव डालती है। लिपि थोड़े विलंब से प्रभाव डालती है।
भाषा ध्वनि-संकेतों की व्यवस्था है। लिपि वर्ण-संकेतों की व्यवस्था है।
भाषा संगीत और वाणी का माध्यम है। लिपि, भाषा का लिखित रूप है।

भाषा व लिपि के अंतर को इनके द्वारा भी जान सकते हैं—

ध्वनि –
भाषा की सबसे छोटी मौखिक इकाई को ध्वनि कहते हैं।
व्यक्त वाक् का छोटा से छोटा अवयव ध्वनि कहलाता है।

वर्ण –
ध्वनि के लिखित रूप को वर्ण कहते हैं।
वर्ण के टुकड़े/खंड नहीं हो सकते— यथा: क्, च्, अ।

अक्षर –
ध्वनियों की संगठित इकाई को अक्षर कहते हैं। यह शब्दों की वह लघुतम इकाई है, जिसका उच्चारण एक ही आघात (झटके) में किया जा सकता है।
अक्षर भाषा की एक मूलभूत उच्चारणात्मक इकाई है, जो वर्ण-चिह्नों के रूप में प्रयोग की जाती है। अक्षरों के संयोग से शब्दों का निर्माण होता है। अक्षर को शब्दांश भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है किसी शब्द के वे अंश जिन्हें एक साथ बोला जाता है। हालांकि, यदि ध्यान से देखें तो ये दोनों भिन्न भी हैं।

अक्षर का शाब्दिक अर्थ – अक्षर शब्द एक तत्सम शब्द है, अर्थात मूल रूप से यह संस्कृत भाषा का शब्द है। यह दो शब्दांशों से मिलकर बना है— अ (धातु का उपसर्ग) + क्षर (नष्ट होना)। अतः इसका शाब्दिक अर्थ है— अनश्वर या जिसे नष्ट न किया जा सके।

अक्षर एक अनेकर्थी शब्द है, अतः इसके भिन्न अर्थ भी हैं; जैसे— अटल, अनश्वर, ईश्वर आदि।

उदाहरण के लिए ‘स्वतंत्रता’ शब्द को लेते हैं—
स्वतंत्रता = स्व + तंत्र + ता (ये शब्दांश भी हैं और अक्षर भी)
लेकिन इसमें प्रयुक्त वर्ण-चिह्न ‘त’, ‘व’ इत्यादि शब्दांश नहीं, वरन् केवल अक्षर हैं।

‘अचानक’ शब्द के तीन शब्दांश होते हैं— अ, चा, नक।

‘बलाघात’ या ‘स्वराघात’ –
जब एक व्यक्ति विचार प्रकट करने के लिए अपने मुख से उच्चारण करता है, तब अपने मन की बात (भाव) का स्पष्ट और उचित अर्थ प्रदान करने के लिए कुछ विशेष वर्ण (अक्षर/ध्वनि), शब्दों या वाक्य पर जोर (बल) दिया जाता है। इसी बल (जोर) देने की क्रिया को ‘बलाघात’ या ‘स्वराघात’ कहा जाता है।
कार्य, वस्तु आदि पर सामान्य से कुछ अधिक बल लगाने का भाव।

बलाघात के सामान्य नियम –
• संयुक्त अक्षर या द्वित्व व्यंजन से पहले वाले अक्षर पर— लग्गी, विष्णु, इंद्र, सच्चा।
• यदि शब्द के सभी अक्षर ह्रस्व होते हैं, तो अंतिम अक्षर पर बलाघात होता है—
यथा: अदरक, कमल।
• विसर्ग अक्षरों में बलाघात होता है— अतः, प्रातः, दुःख।

बलाघात के भेद – वर्ण/अक्षर बलाघात, शब्द बलाघात, वाक्य बलाघात।

वर्ण/अक्षर बलाघात –
वर्ण पर पड़ने वाले बल को वर्ण बलाघात कहते हैं।
उदा.— चला (वह स्कूल से चला) — ‘च’ पर बल
चला (तू गाड़ी चला) — ‘ला’ पर बल

शब्द बलाघात –
शब्द पर पड़ने वाले बल को शब्द बलाघात कहते हैं।
उदा.— तुम नहीं पढ़ोगे। (साधारण)
तुम नहीं पढ़ोगे। (‘नहीं’ पर बल)

वाक्य बलाघात –
वाक्य पर पड़ने वाले बल को वाक्य बलाघात कहते हैं।
उदा.— राम ही जयपुर जाएगा।

अनुतान –
किसी शब्द या वाक्य के उच्चारण में स्वर का उतार-चढ़ाव (आरोह-अवरोह) ही अनुतान है।
उदा.—
अच्छा। (साधारण कथन)
अच्छा? (प्रश्नवाचक रूप में)
अच्छा! (आश्चर्य रूप में)

संगम –
दो पदों की सीमा को जानते हुए उसमें उचित विराम देना ही संगम कहलाता है।
यथा—
सिरका — एक तरल पदार्थ
सिर-का — सिर से संबंधित
जलसा — उत्सव
जल-सा — जल के समान

अनुनासिक स्वर (चंद्रबिंदु) –
जिन स्वरों का उच्चारण मुख व नाक दोनों से किया जाता है, उन्हें अनुनासिक स्वर कहते हैं। अनुनासिक स्वर में मुख से अधिक तथा नाक से कम ध्वनि निकलती है।
उदा.— हँसना, मैं, सरसों, बातें।

अनुनासिक व अनुस्वार में अंतर –
• अनुनासिक स्वर है, जबकि अनुस्वार मूलतः व्यंजन है।
• इनके प्रयोग के कारण अर्थ में अंतर आ जाता है; जैसे—
हंस (एक जल-पक्षी),
हँस (हँसने की क्रिया)।

• अनुनासिक (चंद्रबिंदु) को परिवर्तित नहीं किया जा सकता, जबकि अनुस्वार को वर्ण में बदला जा सकता है।

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