व्यवहार में होने वाले परिवर्तन को ही अधिगम (सीखना) कहते हैं। वे तत्व जो व्यवहार को प्रभावित करते हैं, किसी न किसी रूप में अधिगम को भी प्रभावित करते हैं। बालक का व्यवहार प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देता है, जबकि अधिगम (सीखने की प्रक्रिया) परोक्ष होती है। यह प्रक्रिया तब स्पष्ट होती है जब बालक को किसी विशिष्ट परिस्थिति में रखा जाता है।
मुख्यतः सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित हैं:
- शिक्षक (Teacher)
- शिक्षार्थी (Student/Learner)
- वातावरण (Environment)
- पाठ्यक्रम (Curriculum)
- व्यवस्था (Management)
- मानव संसाधन (Human Resources)
मुख्यतः इन कारकों को छह श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है:
- शिक्षक से संबंधित कारक (Teacher-Related Factors)
जिस प्रकार सीखने की प्रक्रिया में ‘सीखने वाला’ महत्वपूर्ण है, उसी प्रकार ‘सिखाने वाला’ (शिक्षक) भी अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। शिक्षक से संबंधित निम्नलिखित कारक अधिगम को प्रभावित करते हैं:
- शिक्षक का व्यवहार
- मनोविज्ञान का ज्ञान
- विषय-वस्तु की उपयोगिता का ज्ञान
- शिक्षण विधियाँ
- शिक्षक का व्यक्तित्व
- विद्यार्थी से संबंधित कारक (Learner-Related Factors)
किसी भी कार्य को सीखने में विद्यार्थी की मुख्य भूमिका होती है। बालक कितना और किस प्रकार सीखेगा, यह उसकी मूल प्रवृत्तियों और व्यक्तिगत भिन्नताओं पर निर्भर करता है। विद्यार्थी से संबंधित कारक निम्नलिखित हैं:
- बालक का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य
- सीखने का समय
- प्रेरणा (Motivation) का स्तर
- आयु और परिपक्वता
- वातावरण से संबंधित कारक (Environment-Related Factors)
वातावरण अधिगम की गति और गुणवत्ता को गहराई से प्रभावित करता है। इसमें निम्नलिखित बिंदु शामिल हैं:
- विद्यालय की स्थिति और भौतिक वातावरण
- कक्षा का वातावरण (अनुशासन और सहयोग)
- पारिवारिक वातावरण
- सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि
- विषय–वस्तु से संबंधित कारक (Content-Related Factors)
अधिगम की प्रभावशीलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि क्या सीखा जा रहा है। विषय-वस्तु की प्रकृति निम्नलिखित होनी चाहिए:
- विषय-वस्तु सरल, स्पष्ट और बोधगम्य होनी चाहिए।
- यह विद्यार्थी के स्तर के अनुकूल होनी चाहिए ताकि वे उसे समझकर दैनिक जीवन में उपयोग कर सकें।