भाषा विकास

भाषा — भाषा संस्कृत की ‘भाष’ धातु से बना शब्द है, जिसका अर्थ है बोलना या कहना। यह मनुष्य के विचारों, भावनाओं और सूचनाओं को मौखिक, लिखित या सांकेतिक रूप से अभिव्यक्त करने और आदान-प्रदान करने का एक सशक्त सामाजिक माध्यम है। यह समाज के लोगों को जोड़ती है और सांस्कृतिक विकास में भूमिका निभाती है।

भाषा वह साधन है, जिससे किसी समाज के लोग अपने भीतर के भावों और सोच को एक-दूसरे के सामने व्यक्त करते हैं।

भाषा एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है, लेकिन इस प्रक्रिया का स्वरूप बालक की परिपक्वता से निर्धारित होता है। इस दृष्टिकोण से भाषा विकास का अर्थ वह योग्यता है, जो बालक की परिपक्वता के अनुपात में उसे अपने भावों तथा विचारों को दूसरे तक पहुँचाने तथा दूसरों के भावों तथा विचारों को ग्रहण करने में सहायक होती है।

शुरू में नवजात शिशु केवल रोता है, फिर बलबलाता है। फिर एक शब्द द्वारा अपने भावों या विचारों की अभिव्यक्ति करता है और आगे चलकर जटिल वाक्यों के माध्यम से अपने विचारों या भावों को मौखिक रूप से, लिखित रूप से अथवा सांकेतिक (शारीरिक संकेतों) के माध्यम से व्यक्त करने में सक्षम बन जाता है।

मौखिक भाषा बहुत प्रारंभिक वर्षों में ही विकसित हो जाती है। 3 वर्ष की आयु तक बच्चे बातचीत करने में काफी निपुण बन जाते हैं। प्राथमिक विद्यालय के वर्षों के अंत तक वे वाक्यों को समझने तथा बोलने के योग्य बन जाते हैं और लिखित भाषा का उपयोग भी करने लगते हैं।

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