भाषा विकास में अनेक बाधाएँ होती हैं।
(1) विलंबित भाषा — विलंबित भाषा का अर्थ यह है कि किसी बालक की भाषा का विकास उसकी उम्र के अन्य बालकों की अपेक्षा काफी देर से होता है। जैसे 5 वर्ष के स्कूली बालक की शब्दावली सामान्यतः 4000 शब्दों के लगभग होती है। यदि किसी बालक की शब्दावली इससे कम है, तो भाषा विकास विलंबित है।
भाषा विकास में विलंब के अनेक कारण हैं—
(अ) उत्तेजक वातावरण की कमी — जिस वातावरण में बच्चों को नए-नए शब्दों को सुनने तथा सीखने का अवसर नहीं मिलता है। जैसे शहर की अपेक्षा ग्रामीण (देहात) के बच्चों की भाषा विलंबित होती है।
(ब) माता-पिता की ओर से मिलने वाले प्रोत्साहन तथा प्रेरणा का अभाव — जिन बच्चों के भाषा विकास में माता-पिता दिलचस्पी नहीं लेते हैं, उनकी वाणी विलंबित हो जाती है। उनका शब्द-भंडार काफी सीमित बन जाता है।
(स) शिक्षक सहयोग का अभाव — विद्यालय में जिन बालकों की ओर शिक्षक ध्यान नहीं देते हैं और नए-नए शब्दों को सीखने का अवसर नहीं देते हैं, उन बच्चों का शब्द-भंडार सीमित बन जाता है।
(द) दोषपूर्ण विद्यालयी वातावरण — जिन विद्यालयों का वातावरण अनुकूल या उत्तेजक नहीं होता है, उनके शिक्षार्थियों का भाषा विकास विलंबित हो जाता है। उनकी शब्दावली सीमित बन जाती है।
(2) वाणी दोष — भाषा विकास के मार्ग में वाणी दोष भी एक बड़ी बाधा है। दोषपूर्ण वाणी का अर्थ है अयथार्थ वाणी। इस तरह के दोष कभी किसी शब्द के अर्थ में, कभी उच्चारण में तथा कभी वाक्य की संरचना में होते हैं। इन तीनों प्रकार के दोषों की गणना वाणी दोषों में की जाती है।
(3) भाषा (वाणी) विकृतियाँ — रेवर के अनुसार, भाषा विकृति या वाणी विकृति का तात्पर्य बोलने में होने वाली असमानताओं से है।
(अ) उच्चारण विकृति — इस विकृति को स्वानिकी विकृति भी कहते हैं। इस विकृति के अंतर्गत ध्वनि की लुप्ति, ध्वनि की विकृति तथा ध्वनि प्रतिस्थापन की गणना की जाती है। उच्चारण विकृति प्रारंभिक वर्षों में अधिक होती है, बढ़ती हुई आयु के साथ यह मिट जाती है।
(ब) हकलाना — हकलाना एक सामान्य भाषा विकृति है। इस विकृति में संकोचित तथा आवृत्तिमय बोली देखी जाती है, जैसे बालक रुक-रुक कर बोलता है— जैसे क-क-कक्का, पा-पा-पाली। यह 2 से 3 वर्ष के बालकों में अधिक होती है और उम्र के साथ यह विकृति लुप्त होती जाती है।
हकलाना सामान्यतः किशोरावस्था तक चिकित्सा के बिना भी समाप्त हो जाता है।
(स) तुतलाना — बोलते समय जब किसी अक्षर का प्रतिस्थापन दूसरे अक्षर से हो जाता है, तो इसे तुतलाना कहते हैं। जैसे कुछ बालक ‘रोटी’ के बदले ‘लोटी’ और ‘लाल’ के स्थान पर ‘राल’ बोलते हैं। अधिकांश मनोवैज्ञानिकों के अनुसार इस विकृति का कारण दैहिक होता है। यह आयु के साथ समाप्त हो जाती है।
(द) अस्पष्ट उच्चारण — इस वाणी विकृति में बालक किसी शब्द का स्पष्ट उच्चारण करने में समर्थ नहीं रहता। वह किसी शब्द का केवल अस्पष्ट उच्चारण ही कर पाता है, जिससे उसके अर्थ को समझने में कठिनाई होती है।