सृजनात्मकता एवं सृजनात्मक चिंतन

सामाजिक सृजनात्मकता समाज की समस्याओं का समाधान खोजने में सहायक होती है।

शिक्षा के क्षेत्र में सृजनात्मकता का विशेष महत्त्व है। यह विद्यार्थियों को नई सोच विकसित करने, समस्याओं का समाधान करने और आत्मनिर्भर बनने में मदद करती है। सृजनात्मकता के माध्यम से विद्यार्थी पढ़ाई में रुचि लेते हैं और उनका आत्मविश्वास भी बढ़ता है।

सृजनात्मकता को विकसित करने के लिए आवश्यक है कि विद्यार्थियों को स्वतंत्र रूप से सोचने का अवसर दिया जाए। उन्हें प्रश्न पूछने, नई चीजें सीखने और अपने विचार व्यक्त करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इसके अलावा, शिक्षकों को भी शिक्षण में नए-नए तरीकों का उपयोग करना चाहिए, ताकि विद्यार्थियों में सृजनात्मकता का विकास हो सके।

अंत में कहा जा सकता है कि सृजनात्मकता मानव जीवन का एक महत्वपूर्ण गुण है, जो व्यक्ति को प्रगति और सफलता की ओर ले जाता है। यह न केवल व्यक्तिगत विकास में सहायक है, बल्कि समाज और राष्ट्र के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

सृजनात्मकता की परिभाषाएँ

  • गिलफोर्ड के अनुसार, “सृजनात्मकता वह क्षमता है, जिससे व्यक्ति विभिन्न प्रकार के नए-नए विचार करता है।”
  • टॉरेंस के अनुसार, “सृजनात्मकता एक प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति समस्याओं को पहचानता है, समाधान खोजता है और अपने विचारों का परीक्षण या प्रस्तुतीकरण करता है।”
  • ड्रेवर के अनुसार, “सृजनात्मकता वह शक्ति है, जिसके द्वारा व्यक्ति कुछ नया और मूल्यवान उत्पन्न करता है।”
  • क्रो एवं क्रो के अनुसार, “सृजनात्मकता का संबंध कल्पनाशक्ति और नवीन विचारों के निर्माण से है।”
  • कोल एवं ब्रूश के अनुसार, “सृजनात्मकता एक मौलिक उत्पादन के रूप में मानव मन की ग्रहण करने, अभिव्यक्त करने और मूल्यांकन करने की योग्यता एवं क्रिया है।”
  • सी. वी. गुड के अनुसार, “सृजनात्मकता का विचार किसी समूह में विस्तृत सातत्य का निर्माण करता है। सृजनात्मकता के कारक हैं—साहचर्य, आदर्शात्मक मौलिकता, अनुकूलता, सातत्य, लोच तथा तार्किक विकास की योग्यता।”
  • स्टेन के अनुसार, “जब किसी कार्य का परिणाम नवीन हो और किसी समय में समूह द्वारा उपयोगी माना जाए, तो वह कार्य सृजनात्मकता कहलाता है।”

उपरोक्त सभी परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि सृजनात्मकता का संबंध नवीनता, मौलिकता और उपयोगिता से है।

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