भारत में विद्यालयी शिक्षा प्रणाली: प्रवृत्तियाँ, चुनौतियाँ और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हेतु नीतिगत रूपरेखा

भारत विश्व की सबसे बड़ी विद्यालयी शिक्षा प्रणालियों में से एक है, जहाँ लगभग 14.71 लाख विद्यालयों के माध्यम से करीब 24.69 करोड़ विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान की जा रही है। “विकसित भारत 2047” के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ते हुए विद्यालयी शिक्षा की गुणवत्ता, समावेशिता और प्रभावशीलता को राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में देखा जा रहा है। पिछले एक दशक में भारतीय विद्यालयी शिक्षा प्रणाली में उल्लेखनीय परिवर्तन देखने को मिले हैं। पहले जहाँ मुख्य ध्यान विद्यालयों की संख्या, नामांकन और आधारभूत सुविधाओं के विस्तार पर था, वहीं अब सीखने के परिणामों, डिजिटल शिक्षा, शिक्षक विकास और दक्षताआधारित शिक्षण पर अधिक बल दिया जा रहा है।

यद्यपि प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमिकरण, विद्यालयी अवसंरचना और लैंगिक समावेशन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है, फिर भी कई संरचनात्मक चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं। सीखने की गुणवत्ता में असमानता, माध्यमिक स्तर पर विद्यालय छोड़ने की बढ़ती प्रवृत्ति, डिजिटल विभाजन, शिक्षकों की कमी तथा क्षेत्रीय असंतुलन जैसी समस्याएँ शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर रही हैं।

यह लेख भारत की विद्यालयी शिक्षा प्रणाली का एक व्यापक कालानुक्रमिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जिसमें प्रमुख प्रवृत्तियों, सुधारों, नीतिगत पहलों और क्रियान्वयन संबंधी चुनौतियों का अध्ययन किया गया है। साथ ही, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अंतर्गत प्रस्तावित ऐसी नीतिगत रूपरेखा पर भी चर्चा की गई है, जिसका उद्देश्य एक समावेशी, न्यायसंगत और भविष्य उन्मुख शिक्षा प्रणाली का निर्माण करना है।

भारत में विद्यालयी शिक्षा का ऐतिहासिक विकास

भारत में शिक्षा सदैव से सभ्यता के नैतिक और बौद्धिक आधार का केंद्र रही है। प्राचीन काल में गुरुकुल व्यवस्था समग्र शिक्षा पर आधारित थी, जहाँ ‘विद्या’ को जीवन का स्थायी साथी माना जाता था। यह व्यवस्था विनम्रता, नैतिकता और आत्मानुशासन जैसे मूल्यों के विकास पर बल देती थी।

औपनिवेशिक काल में, विशेष रूप से मैकॉले के मिनट (1835) के बाद, भारतीय शिक्षा प्रणाली में बड़ा परिवर्तन आया। शिक्षा का उद्देश्य प्रशासनिक कार्यों हेतु अंग्रेज़ी जानने वाले कर्मचारियों का निर्माण बन गया, जिसके कारण भारतीय भाषाओं और पारंपरिक ज्ञान प्रणाली की उपेक्षा होने लगी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने शिक्षा व्यवस्था के पुनर्निर्माण की दिशा में कार्य किया। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 45 में निःशुल्क एवं सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा का लक्ष्य निर्धारित किया गया।

इसके पश्चात कई महत्वपूर्ण पहलें की गईं—

  • कोठारी आयोग (1964–66): इस आयोग ने कहा था कि “भारत का भविष्य उसकी कक्षाओं में निर्मित हो रहा है।”
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986/92: प्राथमिक विद्यालयों में न्यूनतम सुविधाएँ सुनिश्चित करने हेतु ‘ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड’ प्रारंभ किया गया।
  • सर्व शिक्षा अभियान (2001) एवं शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009: इन पहलों ने 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए शिक्षा को मौलिक अधिकार का स्वरूप प्रदान किया।
  • समग्र शिक्षा अभियान (2018): पूर्व-प्राथमिक से माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा को एकीकृत ढाँचे में शामिल किया गया।

शैक्षिक सुधारों एवं राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के उद्देश्य

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने 21वीं सदी की आवश्यकताओं के अनुरूप विद्यालयी शिक्षा की पुनर्कल्पना की है। इस नीति के अंतर्गत पारंपरिक 10+2 संरचना को बदलकर 5+3+3+4 मॉडल लागू किया गया है।

इस नीति के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं—

  • आधारभूत साक्षरता एवं संख्यात्मक ज्ञान (FLN): कक्षा 3 तक सभी बच्चों में बुनियादी पढ़ने-लिखने और गणना की क्षमता विकसित करना।
  • समग्र विकास: रटने की संस्कृति से हटकर दक्षताआधारित एवं अनुभवात्मक शिक्षण को बढ़ावा देना।
  • प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा (ECCE): 3 से 6 वर्ष तक के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण प्रारंभिक शिक्षा उपलब्ध कराना।
  • समानता एवं समावेशन: सामाजिक एवं आर्थिक रूप से वंचित वर्गों तथा विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए विशेष सहयोग सुनिश्चित करना।

विद्यालयी शिक्षा का कालानुक्रमिक विश्लेषण (2014–2025)

वर्ष 2014 से 2025 के बीच भारत की विद्यालयी शिक्षा प्रणाली में संरचनात्मक परिवर्तन स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। प्रारंभिक वर्षों में मुख्य लक्ष्य विद्यालयों तक पहुँच बढ़ाना था, जबकि हाल के वर्षों में शिक्षा की गुणवत्ता, अधिगम परिणाम, प्रशासनिक दक्षता और कौशल विकास पर अधिक ध्यान दिया गया है।

संस्थागत परिदृश्य

भारत में विद्यालयों की संख्या वर्ष 2017–18 तक लगातार बढ़ी, जिसके बाद इसमें धीरे-धीरे कमी आने लगी। 2024–25 तक विद्यालयों की संख्या लगभग 15.58 लाख से घटकर 14.71 लाख रह गई। हालांकि इसका अर्थ शिक्षा तक पहुँच में कमी नहीं है। यह मुख्यतः “विद्यालय युक्तिकरण” (School Rationalization) की नीति का परिणाम है, जिसके अंतर्गत कम नामांकन वाले विद्यालयों का एकीकरण कर संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित किया गया।

सरकारी विद्यालय आज भी कुल विद्यालयों का लगभग 68.9% हिस्सा हैं। दूसरी ओर, निजी विद्यालयों में नामांकन बढ़ा है, जो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, अंग्रेज़ी माध्यम तथा तकनीकी सुविधाओं के प्रति अभिभावकों की बढ़ती अपेक्षाओं को दर्शाता है।

नामांकन और प्रतिधारण की चुनौतियाँ

प्राथमिक स्तर पर भारत ने लगभग सार्वभौमिक नामांकन प्राप्त कर लिया है, किंतु माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक स्तर पर विद्यार्थियों की संख्या में गिरावट देखी जाती है।

  • प्राथमिक स्तर GER: 90.9%
  • माध्यमिक स्तर GER: 78.7%
  • उच्च माध्यमिक स्तर GER: 58.4%

यह आँकड़े एक “पिरामिडीय” शिक्षा संरचना को दर्शाते हैं, जिसमें उच्च स्तरों पर पहुँचते-पहुँचते विद्यार्थियों की संख्या कम होती जाती है। आर्थिक दबाव, सामाजिक बाधाएँ, प्रवास, परीक्षा तनाव तथा निकटवर्ती विद्यालयों की कमी इसके प्रमुख कारण हैं।

पहुँच, समानता एवं समावेशन

किसी भी शिक्षा प्रणाली की वास्तविक सफलता इस बात से मापी जाती है कि वह समाज के कमजोर वर्गों तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुँचती है।

  • लैंगिक एवं सामाजिक असमानता: प्राथमिक स्तर पर लड़कियों की भागीदारी में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, किंतु माध्यमिक स्तर पर घरेलू जिम्मेदारियाँ और सुरक्षा संबंधी चिंताएँ उनके विद्यालय छोड़ने का कारण बनती हैं।
  • अनुसूचित जाति एवं जनजाति: SC/ST विद्यार्थियों की विद्यालयी पहुँच में सुधार हुआ है। फिर भी भाषा एवं गणितीय दक्षताओं में सीखने का अंतर अभी भी बना हुआ है।
  • विशेष आवश्यकता वाले बच्चे (CwSN): लगभग 79.1% विद्यालयों में रैंप की सुविधा उपलब्ध है, लेकिन केवल 33.4% विद्यालयों में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए अनुकूल शौचालय हैं।

शिक्षा की गुणवत्ता एवं आधारभूत साक्षरता

विद्यालयी शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल नामांकन नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण अधिगम सुनिश्चित करना है। ASER तथा PARAKH 2024 की रिपोर्टें इस दिशा में मिश्रित स्थिति दर्शाती हैं।

  • कक्षा 3 के विद्यार्थियों में पढ़ने और गणना करने की क्षमता में सुधार हुआ है।
  • फिर भी लगभग 50% बच्चे कक्षा 5 तक पहुँचने के बाद भी कक्षा 2 स्तर का पाठ नहीं पढ़ पाते।
  • गणित आज भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। अनेक विद्यार्थी अवधारणाएँ पहचान तो लेते हैं, लेकिन उन्हें व्यवहारिक जीवन में लागू नहीं कर पाते।

शिक्षक शिक्षा एवं व्यावसायिक विकास

भारत के लगभग 1.01 करोड़ शिक्षक शिक्षा प्रणाली की आधारशिला हैं। इसके बावजूद शिक्षकों पर गैर-शैक्षिक कार्यों का बोझ बना हुआ है।

  • बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में शिक्षकों के लाखों पद रिक्त हैं।
  • शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) में केवल 10–15% अभ्यर्थियों का सफल होना शिक्षक गुणवत्ता की चुनौती को दर्शाता है।
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुसार चार वर्षीय समेकित बी.एड. को न्यूनतम योग्यता बनाया गया है तथा DIKSHA और NISHTHA जैसे मंचों के माध्यम से सतत व्यावसायिक विकास पर बल दिया गया है।

अवसंरचना एवं डिजिटल शिक्षा

आधुनिक शिक्षा के लिए विद्यालयों की भौतिक एवं डिजिटल तैयारी अत्यंत आवश्यक है।

  • विद्यालयों में बिजली की उपलब्धता 56% से बढ़कर 91.9% हो गई है।
  • लगभग 94% विद्यालयों में बालिकाओं के लिए शौचालय उपलब्ध हैं।
  • हालांकि केवल 63.5% विद्यालयों में इंटरनेट सुविधा उपलब्ध है।
  • ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच डिजिटल असमानता अभी भी गंभीर समस्या है।
  • लगभग आधे सरकारी माध्यमिक विद्यालयों में विज्ञान प्रयोगशालाओं का अभाव है।

व्यावसायिक शिक्षा एवं कौशल विकास

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का लक्ष्य वर्ष 2025 तक कम से कम 50% विद्यार्थियों को व्यावसायिक शिक्षा से जोड़ना है।

  • कक्षा 6 से व्यावसायिक विषयों का समावेश किया जा रहा है।
  • “बैगलेस डे” जैसी पहलें व्यावहारिक शिक्षा को बढ़ावा देती हैं।
  • फिर भी समाज में व्यावसायिक शिक्षा को कम महत्व दिए जाने की मानसिकता एक बड़ी चुनौती है।
  • राष्ट्रीय क्रेडिट फ्रेमवर्क (NCrF) अकादमिक और व्यावसायिक शिक्षा के बीच लचीले समन्वय को संभव बनाएगा।

शासन एवं विद्यालय प्रबंधन

भारतीय शिक्षा प्रशासन में विभिन्न स्तरों पर समन्वय की कमी देखी जाती है।

  • विद्यालय प्रबंधन समितियाँ (SMCs) कई स्थानों पर सक्रिय रूप से कार्य नहीं कर पा रही हैं।
  • “स्कूल कॉम्प्लेक्स” मॉडल के माध्यम से संसाधनों का साझा उपयोग करने की सिफारिश की गई है, जिससे प्रयोगशालाएँ, पुस्तकालय और विशेषज्ञ शिक्षक अनेक विद्यालयों द्वारा उपयोग किए जा सकें।

मूल्यांकन एवं अधिगम परिणाम

भारत की शिक्षा प्रणाली अब रटने पर आधारित परीक्षाओं से हटकर दक्षताआधारित मूल्यांकन की ओर बढ़ रही है।

  • PARAKH: यह राष्ट्रीय मूल्यांकन केंद्र विद्यार्थियों की अवधारणात्मक समझ और व्यावहारिक ज्ञान पर आधारित मूल्यांकन को बढ़ावा देता है।
  • समग्र प्रगति पत्र (Holistic Progress Card): इसमें विद्यार्थियों के बौद्धिक, सामाजिक एवं भावनात्मक विकास का समग्र मूल्यांकन किया जाएगा।

राज्यों की नवाचारी पहलें

कई राज्यों ने शिक्षा सुधार के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए हैं—

  • राजस्थान: “आदर्श विद्यालय” मॉडल के माध्यम से विद्यालय युक्तिकरण।
  • कर्नाटक: “कलिका चेतरिका” कार्यक्रम द्वारा अधिगम पुनर्प्राप्ति।
  • नागालैंड: “लाइटहाउस कॉम्प्लेक्स” मॉडल के माध्यम से संसाधन साझेदारी।
  • आंध्र प्रदेश: “वी लव रीडिंग” अभियान द्वारा पठन कौशल में सुधार।

प्रमुख चुनौतियाँ

महत्वपूर्ण प्रगति के बावजूद कई गंभीर समस्याएँ अभी भी बनी हुई हैं—

  1. केवल लगभग 5% विद्यालय ही कक्षा 1 से 12 तक निरंतर शिक्षा उपलब्ध कराते हैं।
  2. पाठ्यक्रम पूरा करने के दबाव में अवधारणात्मक समझ की उपेक्षा होती है।
  3. एक-तिहाई से अधिक विद्यालयों में अभी भी इंटरनेट सुविधा उपलब्ध नहीं है।
  4. प्रारंभिक स्तर पर उत्पन्न अधिगम अंतर समय के साथ और अधिक बढ़ जाता है।

नीतिगत रूपरेखा एवं भविष्य की दिशा

विकसित भारत 2047” के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए शिक्षा प्रणाली में केवल विस्तार नहीं, बल्कि संरचनात्मक परिवर्तन आवश्यक हैं।

प्रणालीगत सुझाव

  • पिरामिडीय शिक्षा संरचना के स्थान पर समेकित विद्यालय मॉडल विकसित किए जाएँ।
  • स्कूल कॉम्प्लेक्स को संस्थागत रूप दिया जाए।
  • प्रशासनिक रिक्तियों को शीघ्र भरा जाए तथा निरीक्षण प्रणाली को शैक्षणिक मार्गदर्शन में परिवर्तित किया जाए।

शैक्षणिक सुझाव

  • “Teaching at the Right Level (TaRL)” पद्धति को बढ़ावा दिया जाए।
  • शिक्षकों को विषय विशेषज्ञ और शैक्षणिक नेतृत्वकर्ता के रूप में विकसित किया जाए।
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित शिक्षण एवं मूल्यांकन प्रणालियों का उपयोग बढ़ाया जाए।

निष्कर्ष

भारत की विद्यालयी शिक्षा प्रणाली वर्तमान समय में परिवर्तन के एक महत्वपूर्ण दौर से गुजर रही है। पिछले दशक में शिक्षा तक पहुँच, विद्यालयी अवसंरचना, लैंगिक समावेशन तथा आधारभूत अधिगम के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। किंतु अब सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक बच्चे को गुणवत्तापूर्ण, समावेशी और भविष्य उन्मुख शिक्षा प्राप्त हो।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 दक्षताआधारित शिक्षा, शिक्षक सशक्तिकरण, डिजिटल एकीकरण, व्यावसायिक शिक्षा तथा समग्र विकास के माध्यम से शिक्षा प्रणाली को नई दिशा प्रदान करती है। हालांकि किसी भी नीति की सफलता उसके प्रभावी क्रियान्वयन, पर्याप्त निवेश, प्रशासनिक समन्वय तथा सामुदायिक सहभागिता पर निर्भर करती है।

भारत की जनसांख्यिकीय शक्ति का वास्तविक लाभ तभी प्राप्त किया जा सकता है जब विद्यालय केवल परीक्षा केंद्र न होकर सृजनात्मकता, आलोचनात्मक चिंतन, नवाचार और मानवीय मूल्यों के विकास के केंद्र बनें। एक मजबूत और न्यायसंगत विद्यालयी शिक्षा प्रणाली न केवल आर्थिक विकास के लिए आवश्यक है, बल्कि एक जागरूक, कुशल और उत्तरदायी राष्ट्र के निर्माण की आधारशिला भी है।

इस नीति के अंतर्गत 10+2 प्रणाली को बदलकर 5+3+3+4 संरचना लागू की गई है, जिसमें पूर्व-प्राथमिक शिक्षा को भी विद्यालयी ढाँचे में शामिल किया गया है।

PARAKH राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अंतर्गत स्थापित एक राष्ट्रीय मूल्यांकन केंद्र है, जिसका उद्देश्य रटने की प्रवृत्ति के स्थान पर दक्षताआधारित मूल्यांकन को बढ़ावा देना है।

विद्यालयों की संख्या में कमी मुख्यतः विद्यालय युक्तिकरण के कारण हुई है, जिसके अंतर्गत कम नामांकन वाले विद्यालयों का एकीकरण कर बेहतर संसाधन और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का लक्ष्य वर्ष 2025 तक कम से कम 50% विद्यार्थियों को व्यावसायिक शिक्षा से जोड़ना है।

Author
Dr. A. K. Pandey

15 thoughts on “भारत में विद्यालयी शिक्षा प्रणाली: प्रवृत्तियाँ, चुनौतियाँ और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हेतु नीतिगत रूपरेखा”

  1. Raghu Nandan Singh

    तार्किक और विश्लेषणात्मक विचार
    ज्ञानवर्धक संदेश

  2. Dr. Manoj Kumar Sharma

    भारतीय शिक्षा से संबंधित ज्ञानवर्धक जानकारी देने के लिए धन्यवाद

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